Sunday, February 11, 2018

हमारे पड़ोसी श्री छद्मी लाल जी, एक स्थापित साहित्यकार हैं। कविता, कहानी, व्यंग्य से ले कर नाटक, उपन्यास तक उनका पूरा दखल है। कुल मिला कर साहित्य की कोई भी विधा, उनसे अछूती और अछूटी नहीं है। पूरा शहर उनके कलाम से त्रस्त है।
श्री छद्मी लाल जी, स्थापित कब, कहाँ और कैसे हुए, ये बात पूरा मोहल्ला अब तक नहीं जान पाया है। हमने जब होश संभाला, तब तक स्वनाम धन्य, श्री छद्मी लाल जी, पूरे शहर में सुने-पढ़े और जाने, जाने लगे थे. साहित्यिक कार्यक्रमों में उनकी बुकिंग, बकायदा टेंट हॉउस के सामान के साथ ही हुआ करती थी।
पिछले कुछ अरसे से उन्होंने अपना तखल्लुस 'ज़ालिम' लिखना शुरू कर दिया है। हमने उनसे इस परिवर्तन का कारण पूछा तो बोले,"वो क्या है ना...कि जिस तरह असद साहब, 'ग़ालिब' का तख़ल्लुस लगा कर अमर हो गये हैं, हम भी उसी तरह 'ज़ालिम' के नाम से अमर होना चाहते हैं...!!"
हमने ख़ामोशी से आगे बढ़ते-बढ़ते, मन ही मन सोचा, 'ज़ालिम' तख़ल्लुस लगाने की क्या जरुरत थी, सारा शहर आपको पहले से ही 'ज़ालिम' मानता है!
~गौतम केवलिया, बीकानेर।
#HariBol
फासले घरों के तो कम हो गए थे 'गौतम'
दूरियाँ दिलों की मुसल्सल बढ़ती ही रहीं!
#HariBol

Thursday, August 15, 2013

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Monday, September 17, 2012

प्यार अँधा है

एक बार की बात है. ईर्ष्या, प्यार, नफरत, दर्द आदि सब भावनाओं (Feelings) ने आपस में मिल कर छुपम-छुपाई खेलने का फैसला किया.
पहली डेन किसकी हो, यह फैसला करने के लिए सिक्का उछाल कर निर्णय लिया गया. अंतत: डेन लाने की पहली बारी दर्द की आई.
दर्द ने गिनती शुरू की. सब भावनाएं छुप गयीं.
झूठ, पेड़ के पीछे छुप गया....
प्यार, गुलाब की झाड़ी के नीचे झुक कर बैठ गया...
ईर्ष्या, बरगद के घने पेड़ में जा छुपी..
सब भा
वनाएं अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से छुप कर बैठ गयीं.
दर्द ने सब भावनाओं को ढूंढना शुरू किया. एक-एक करके सब पकड़े गए सिवाय प्यार के!
ईर्ष्या ने दर्द को चुपके से बता दिया कि प्यार कहाँ छुपा है....
दर्द धीरे से गुलाब की झाड़ी के पास पहुंचा और प्यार की बांह पकड़ कर, झाड़ी से खींच कर बाहर निकाल लाया.
झाड़ी से खींचने की आपाधापी में गुलाब की झाड़ी के कांटे, प्यार की आँखों में चुभ गए और प्यार की आँखें खराब हो गयीं.
मामला ईश्वर के दरबार में पहुंचा. सारी बात सुनने के बाद, ईश्वर ने दर्द को सज़ा सुना दी.
ईश्वर ने दर्द को सज़ा देते हुए कहा,"चूँकि तुम्हारे कारण प्यार की आँखें खराब हुईं हैं, इसलिए आज के बाद, तुम्हें हमेशा प्यार के साथ ही रहना पड़ेगा!"
उस दिन से प्यार अँधा है और दर्द हमेशा उसके साथ होता है....

Sunday, September 16, 2012

हिना से तो बेहतर

माशूका जब अपने दिलबर से मिलने आई
दिलबर को ना पा कर वहाँ बहुत घबराई
घबराहट में उसने अपने दिलबर को तुरंत फोन लगाया
दिलबर के मोबाइल की रिंगटोन को पास ही बजते पाया
दिलबर माशूका को देख कर मुस्कुराया
माशूका को ये माजरा समझ नहीं आया
दरअसल वो अपने दिलबर को पहचान ही नहीं पाई थी
दिलबर ने अपने बालों में खिजाब नहीं हिना लगाई थी
माशूका नाराज़ हो गयी अपने दिलबर से
नाराज़गी को परोसते हुए बोली दिलबर से
खिजाब खत्म हो गया था पहले बता दिया होता
हिना से तो बेहतर था हिजाब लगा लिया होता !!
~गौतम केवलिया.
Hari Bol...

Wednesday, February 29, 2012

वक़्त वक़्त की बात....


एक वो वक़्त था जब हम अपने प्रेम का इज़हार करने के लिए लाल गुलाब ले कर आते थे और बेगम साहिबा उस गुलाब के फूल को बड़ी शिद्दत के साथ सहेज कर रक्खा करतीं थीं. वक्त बदला, हालात बदले, गुलाब के आदान-प्रदान का वो हसीं सिलसिला वक़्त की मारामारी में कब और कहाँ खो गया, कुछ पता ही नहीं चला....
आज मुद्दत बाद सुबह बागीचे में पानी देते वक़्त हमारी नज़र खिले हुए सुर्ख लाल गुलाब के फूलों पर पड़ीं, ना जाने क्यों, गुज़रा हुआ ज़माना याद आ गया. ना चाहते हुए भी हमने एक अदद गुलाब का फूल तोड़ लिया और जा पहुंचे बेगम साहिबा के सामने. हम फूल पेश कर, अपने प्रेम का इज़हार कर पाते, इससे पहले ही बेगम साहिबा की कड़कती आवाज़ हमारे कर्ण-पटल से टकराई,"आपने ये फूल क्यों तोड़ा? मैंने गुलकंद बनाने के लिए उगाये हैं...आपको तोड़ने से पहले पूछना चाहिए था.....!!''वगैरह-वगैरह.
हमने मन ही मन सोचा, इन फूलों का गुलकंद तो ना जाने कब बनेगा, बनेगा भी या नहीं...मगर हमारे प्रेम-प्रदर्शन यानी इज़हार-ए-मोहब्बत के नेक इरादे का गुलकंद तो बन ही गया. हम चुपचाप वापस बागीचे में पानी देने चले आये..
पड़ोस में कहीं शींरी-फरहाद का गीत गूँज रहा था-
'गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा
हाफ़िज़ ख़ुदा तुम्हारा...'

Sunday, May 1, 2011

अब कोई गुलशन ना उजड़े, अब वतन आज़ाद है!

ना तीर निकालो, ना तलवार निकालो,
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो!
आज़ादी से पहले, ये शे'र हमारे क्रांतिकारियों के दिल-ओ-दिमाग़ में अपने गुलाम मुल्क को अंग्रेजों से आज़ाद करवाने के लिए जरूर जोश भरने का काम किया करता था. कलम की ताकत ने अंग्रेजों को बहुत हद तक अपने हथियार डालने पर मजबूर कर दिया था. निश्चय ही किसी ज़माने में ये शे'र प्रासंगिक रहा होगा बल्कि यूँ कहना चाहिए, रहा था मगर आज के दौर में यही शे'र प्रासंगिक कम फंतासी ज़्यादा लगता है. आज से तीन-चार दशक पहले तक स्थिति ये थी कि अगर किसी व्यक्ति को अपनी किसी बात के पुख्ता होने का प्रमाण देना होता था तो वो हवाला देता था-'ये बात फलां अखबार में छपी है!' और आज स्थिति ये है कि वही व्यक्ति ये कहने से भी नहीं चूकता है-'अरे भाई, ये तो अखबारी ख़बर है!!'
वास्तव में आज अखबार का अस्तित्व ही संकट में पड़ता नज़र आ रहा है. सुबह उठते ही अखबार हाथ में लेना अब एक खानदानी रस्म से ज़्यादा कुछ नहीं रह गया है. एक ज़माना था जब ख़बरों का प्रमुख ज़रिया अखबार ही हुआ करता था. रेडियो-ट्रांजिस्टर की अपनी सीमायें थीं, वो कुछ ख़ास और महत्वपूर्ण समाचारों का प्रसारण ही कर पाते थे. उनके प्रसारण की एक समय-सीमा भी निर्धारित थी. लोक-चाव की ख़बरों के लिए उनके पास कोई वक़्त नहीं होता था. दूसरे शब्दों में कहें तो रेडियो-ट्रांजिस्टर की खबरें, बस्स.. खबरें ही हुआ करती थीं. ख़बरों का विश्लेषण और ख़बरों के अन्दर की ख़बर, अखबार ही लिया करते थे. उस ज़माने में सुबह घर में अखबार आते ही हलचल शुरू हो जाती थी. घर के बड़े-बुजुर्गों से लेकर छोटे बच्चे तक सभी अपनी-अपनी हैसियत के हिसाब से अपनी बारी का इंतज़ार किया करते थे.
आज के दौर में बुजुर्गों की हैसियत की बात तो बेमानी हो गयी है. अगर घर का बड़ा-बुज़ुर्ग कुछ कहने की जुर्रत करता है तो आज का युवा, उस बुज़ुर्ग को उसकी हैसियत समझाने से भी परहेज़ नहीं करता. ज़्यादातर घरों में तो बुजुर्गों को उनकी हैसियत समझ में आई हुई है इसलिए ऐसे तथाकथित आदर्श परिवारों का ज़िक्र हम नहीं करेंगे....
बात शे'र से शुरू हुई थी मगर रस्ता भटक गयी. तो लो जनाब हम वापस अपने रस्ते पर आते हैं. हमारा बचपन अखबार के स्वर्णिम युग का चश्मदीद गवाह रहा है. बचपन का ज़िक्र इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उस वक़्त तक कम से कम हमारे शहर में तो दूरदर्शन का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था. हमें अच्छी तरह याद है, जब हम दसवीं जमात में दूसरी बार नाकामयाब हुए थे, उसके अगले ही दिन हमारे वालिद साहब एक अदद ब्लेक एंड व्हाइट पोर्टेबल टीवी ले कर आये थे और हमने खुद ही उसे अपना इनाम मान कर, मन ही मन इतराना शुरू कर दिया था. टीवी और दूरदर्शन उस ज़माने में पर्यायवाची हुआ करते थे क्योंकि उस वक़्त का टीवी, सिर्फ और सिर्फ दूरदर्शन ही दिखाया करता था. दूरदर्शन ने ख़बरों को एक नया अंदाज़ दिया. अब ख़बर का वीडियो भी देखने को मिलने लगा और ख़बर ज़्यादा जीवंत, ज़्यादा खुशनुमा बनने लगी. दूरदर्शन का ये प्रयास आम आदमी को कब अखबार से दूर ले जाने लगा, पता ही नहीं चला. अब लोगों को खबरें भी किसी हिंदी फिल्म की माफिक़ लगने लगीं थीं.
धीरे-धीरे दूरदर्शन के साथ-साथ दूसरे चैनलों का जन्म हुआ. ख़बरों का रूप और बदलने लगा. अखबार के अस्तित्व को सबसे बड़ा झटका उस वक़्त लगा जब 'खबरिया' चैनलों की शुरुआत हुई. अब आम आदमी अपनी सुविधा के हिसाब से खबरें देखने लगा और खबरें पढने का जुनून, कब खबरें देखने का शौक बन गया, किसी को पता ही नहीं चला. वक़्त के इस ऐतिहासिक बदलाव ने जहाँ एक ओर अखबारों की नीवं हिलाने की पहल की वँही दूसरी ओर 'खबरिया' चैनलों ने ख़बरों के रूप को ही बदल कर रख दिया. अलग-अलग चैनलों के दावे सामने आने लगे कि 'फलां ख़बर को सबसे पहले हमने दिखाया..' और 'फलां घटना स्थल पर हमारे संवाददाता सबसे पहले पहुंचे' वगैहरा-वगैहरा. इस आपाधापी की होड़ में जंहा एक ओर आतंकवादियों ने होटल ताज की बर्बर घटना को अंजाम दिया वँही दूसरी ओर अखबारों का अस्तित्व और गहरे संकट में आ गया. आज हम-आप सभी जानते हैं कि हमारे मुल्क के तथाकथित 'खबरिया' चैनलों पर लाइव प्रसारित होने वाली ख़बरों ने होटल ताज में छिपे आतंकवादियों को किस कदर मदद की थी. उनका पूरा नेटवर्क हमारे इन 'खबरिया' चैनलों की मेहरबानियों से ही चल रहा था. प्रेस की स्वतंत्रता किस हद तक होनी चाहिए ये एक विचारणीय प्रश्न है.
ख़ैर जनाब, हम फिर अपने मुद्दे से भटक गए. बात चल रही थी अखबार की. आज हम सभी अखबार पढ़ते जरूर हैं मगर उसमें वो बात नहीं होती जो अखबार में होनी चाहिए. कमोबेश सभी खबरें हम पढने से पहले देख चुके होते हैं. जिस मैच को आपने दिन भर टीवी के आगे बैठ कर लाइव देखा था, उसकी ख़बर में आपको भला क्या इंटरेस्ट होगा! आज जरुरत इस बात की है की हर एक व्यक्ति, हर एक संस्था, हर एक सरकार अपनी अपनी जिम्मेदारियों को स्वयं तय करे, स्वयं परिभाषित करे.
ये सही है कि ख़बरों की उपलब्धता 'खबरिया' चैनलों पर पहले होना लाज़िमी है मगर ख़बरों का सही विश्लेषण और उसके निकट एवं दूरगामी प्रभावों की विस्तृत विवेचना ही आज के दौर में अख़बारों को अस्तित्व-संकट से बचा सकती है. अखबारों का निर्भीक होने साथ-साथ निष्पक्ष होना पहली जरुरत है. अख़बारों की ख़बर सच्चाई पर आधारित हो, ना कि मसाला-माल पर! पत्रकारों की ये जिम्मेदारी, खुद पत्रकार को ही तय करनी होगी. वरना कंही ऐसा ना हो कि किसी शाही शादी की ख़बर, किसी मज़लूम औरत के साथ ट्रेन में हुए बलात्कार की ख़बर को भुला दे और कोई गुनाहगार रेलकर्मी बलात्कार करने के बाद भी बा-इज्जत बरी हो जाये!